तुम भी क्या याद करोगे।

चलो यकीन कर लिया 

के तुम मासूम हो ,

के कहके के दर्द 

तुम्हारा अपना हैं। 

तुम सच में मासूमियत से 

बच जाओगे ?

अपने ही बनाये गड्ढे 

में से तुम उभर जाओगे ?

तो क्यों तुमने पुराने जख्म 

ताज़ा किये 

दुनिया के लिए खड़े 

अफ़साने मज़ाकिये। 


चलो मान लिया के 

तुम मासूम हो 

पर क्या सच में 

हर बात से बेमालूम हो ?

के ज़ालिम तीर चलाया नज़र का 

के छुरी उस पार न हो गयी।  

के अब ना जीना ढंग का 

न मौत मुनासिब रही। 

                        - काजल 



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